गंगा भगवान् शिव की जटाओ से क्यों परवाहित होती है ?

    

गंगा नदी भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है! गंगा के कई नाम हैं जैसे की जाहनवी और भागीरथी! गंगा नदी मात्र एक जल का स्त्रोत नहीं है बल्कि एक पूजनीय देवी है जिसे हिन्दू धर्म के अनुसार गंगा माँ और देवी गंगा के नाम से संबोधित किया जाता है! यदि आप शिव जी को ध्यान से देखे तो आपको पता लगेगा उनकी जटाओं में से गंगा नदी की धारा निकलती है, लेकिन आखिर गंगा देवी शिवजी के जटाओं में क्यों वास करती हैं! आइये इस प्रश्न का उत्तर हम जानते है!

पुराणों के अनुसार, गंगा देवी प्रथ्वी पर आने से पहले सुर लोक में निवास किया करती थी! गंगा नदी के प्रथ्वी लोक में आने के पीछे बहुत सी कथाएँ प्रचलित है! उन्ही में से सबसे प्रसिद्ध कथा इस प्रकार है, प्राचीन काल में पर्वतो के राजा हिमालय की दो सुन्दर कन्याएं थी जो कि सर्वगुण संपन्न थी!

दोनों कन्याओं में बड़ी कन्या का नाम था गंगा और छोटी का नाम था उमा! कहा जाता है की बड़ी कन्या गंगा अत्यंत सुन्दर,प्रभावशाली तथा असाधारण शक्तियों से भरपूर थी! लेकिन उसे बन्धनों में रहना पसंद नहीं था वह हमेशा अपने मन की ही किया करती थी!

एक बार देवताओं की दृष्टि सुर लोक में रहने वाली गंगा पर पड़ी! उसके इतने प्रभावशाली व्यक्तित्व को देख कर वे मंत्र मुग्ध हो गए! उन्होंने उसकी असाधारण प्रतिभा को देखते हुए उसे स्रष्टि के कल्याण के लिए ले जाने का निर्णय लिया और इस प्रकार देवता गंगा को अपने साथ स्वर्गलोक ले गए! अब पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा भी बड़ी हो गई! वह शिव भगवान् की बहुत बड़ी पुजारिन थी और मन ही मन शिव भगवान को अपना पति स्वीकार करने लगी! इस प्रकार शिव भगवान् की घोर तपस्या करके उसने शिव भगवान् से वरदान माँगा और उन्हें अपने पति के रूप में प्राप्त कर लिया

शिव भगवान् और उमा का विवाह हुआ परन्तु विवाह के कई वर्षो बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई! एक दिन शिव भगवान् ने संतान उत्पत्ति की सोची जब यह बात ब्रह्मा जी तक पहुंची तो सभी देवता चिंता में पड़ गए!

उन्हें यह समझने में कष्ट हो रहा था कि जिस प्रकार महादेव अत्यंत तेजस्वी देव थे तो उनकी संतान भी अत्यंत तेजस्वी होगी और इस प्रकार उसके तेज़ को कौन संभाल पायेगा! इस समस्या को भगवान् शिव के अलावा कोई और नहीं सुलझा सकता था इसलिए वे सब भगवान् शिव के पास गए और अपनी समस्या बताई! भगवान महादेव के कहे अनुसार, अग्नि देव ये भार ग्रहण करने को तैयार हो गए और इस प्रकार कार्तिकेय रुपी तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ!

इस बात से क्रोधित होकर उमा ने देवताओं को श्राप दिया कि वे कभी पिता नहीं बन पाएंगे! इसी बीच गंगा की उमा से भेंट हुई उन्होंने बोला की वे अब स्वर्गलोक में नहीं रहना चाहती वे प्रथ्वी पर जाना चाहती है ये सुन कर उमा ने कहा की वे जल्द ही उन्हें कोई मार्ग बतायेंगी!

वही दूसरी तरफ प्रथ्वी पर राजा भागीरथ  थे जिनकी कोई संतान नहीं थी उनको उन्होंने गंगा की तपस्या करने का निर्णय लिया और वे हिमालय की और चले गए!

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव जी प्रकट हुए और मनवांछित फल मांगने के लिए बोलने लगे! इस पर भागीरथ ने कहा की अपने पूर्वजो की मुक्ति के लिए उन्हें गंगा का जल चाहिए! महादेव  ने कहा कि वे गंगा का वेग सहन करने के लिए तैयार हैं और इस प्रकार उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया और गंगा नदी की धरती पर उत्पत्ति हुई!