ऋषि भृंगि और अर्धनारीश्वर महादेव

    

भगवान् शिव के उपासक ऋषि भृंगि शिव की परिकर्मा करना चाहते थे , लेकिन देवी पार्वती को ये पसंद नहीं था| भृंगि  ऋषि की शिव परिक्रमा को बाधित करने के लिए पार्वती शिव की गोद में विराजमान हो जाती है, ताकि ऋषि उनके बीच से नहीं निकल सके | ये देख ऋषि ने अपने आकार को छोटा कर मधुमखी का रूप धारण कर लिया | पार्वती ने भृंगि ऋषि को पहचान लिया और अनपे आप को शिव में समाहित कर लिया| भगवान शिव के इस रूप को हम अर्धनारीश्वर कहते है|

भृंगि ऋषि अभी भी अपनी भक्ति पर अडिग थे और भगवान् शिव की परिकर्मा के लिए कीड़े का रूप परिवर्तित कर लिया| ऋषि के इस प्रयास ने पार्वती को क्रोधित कर दिया| पार्वती ने ऋषि को श्राप दिया कि उसके शरीर का प्रत्येक अंग अलग हो जायेगा| पार्वती के श्राप से ऋषि का शरीर कंकाल में परिवर्तित हो गया|

ये कहानी ये दर्शाती है कि यदि मनुष्य भगवान् के अर्धनारी हिस्से का सम्मान नहीं करेगा तो उसके जीवन में कष्टो का आगमन होगा| भगवान शिव का अर्धनारीश्वर स्वरूप स्त्री-पुरुष की समानता का प्रतिक है| समाज, परिवार और जीवन में दोनों का बराबर महत्व है|