भगवान गणेश का नाम एकदंत कैसे पड़ा!!

    
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गणपति जी को हर काम में सबसे प्रथम निमंत्रण भेजा जाता है ! उनके १०८ नामों में से एक नाम एकदंत भी है !यदि आप भगवान् गणेश की मूर्ति ध्यान से देखे तो आपको पता लगेगा कि उनका एक दांत आधा टूटा हुआ है, इसलिए भगवान् गणेश को एकदंत भी कहा जाता है! लेकिन उन्हें एकदंत क्यों कहा जाता है ? और किस कारण की वजह से उनका दांत टूट गया ? आइये जानते हैं,

वैसे तो इससे जुडी हुई बहुत सी कथाएँ हमारे पुराणों द्वारा बताई गई हैं, परन्तु दो कहानियां प्रसिद्ध हैं! पहली कथा के अनुसार, दुनिया का सबसे लम्बा व बड़ा महाकाव्य लिखना किसी भी साधारण व्यक्ति के वश में नहीं था, इसलिए महर्षि व्यास ने गणेश जी से अनुरोध किया कि वे स्वयं इसे लिखे! गणेश जी ने सोच विचार कर के इस कार्य को करने के लिए सहमति तो दे दी परन्तु उन्होंने एक शर्त व्यास ऋषि के सामने रख दी! इस शर्त की हिसाब से व्यास मुनि उन्हें सारी महाभारत बिना रुके सुनाएँगे! व्यास ऋषि ने इस शर्त को स्वीकार करते हुए भगवान् गणेश को बिना रुके महाभारत की कथा सुनना शुरू किया!

जब गणेश जी महाभारत लिख रहे थे तो लिखते हुए उनकी लेखनी टूट गई परन्तु महाभारत बीच में रुक नहीं सकती थी, इसलिए गणेश जी ने अपना दांत तोड़ दिया और उसे कलम बना कर महाभारत लिखने लगे! इस प्रकार गणेश जी ने पूरी महाभारत लिखी ! इस कथा से यह सन्देश मिलता हैं की कभी भी कोई बलिदान आपको ज्ञान प्राप्त करने से नहीं रोक सकता ! इसके अलावा हर किसी को वचनबद्ध होकर अपना कार्य पूर्ण करना चाहिए ! तब से गणेश भगवान् को एकदन्त कहा जाने लग गया!

दूसरी कथा के अनुसार, एक बार भगवान् महादेव अपने कक्ष में विश्राम कर रहे थे तभी परशुराम जी कैलाश पर्वत पर आए और उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की ! गणपति जी अपने पिताजी की नीदं ख़राब नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने परशुराम जी को शिव जी से मिलने से मना कर दिया! इस बात पर परुशराम जी बहुत क्रोधित हो गए! उन्होंने बहुत प्रयास किये जिससे किवे शिव जी के कक्ष में जा सके परन्तु उनका हर प्रयास असफल रहा! गणेश जी के इस व्यव्हार से परशुराम जी बहुत अधिक क्रोधित हो गए और देखते ही देखते परशुराम जी और गणेश जी के बीच में युद्ध छिड गया! युद्ध के दौरान परशुराम जी ने अपनी कुल्हाड़ी से गणेश जी पर प्रहार किया ! वह कुल्हाड़ी शिवजी ने परशुराम जी को दी थी ! गणेश जी उस कुल्हाड़ी को पहचान गए और उन्होंने उसका अपमान नहीं किया! उन्होंने वह प्रहार स्वीकार कर लिया! उस प्रहार से उनका एक दांत टूट गया! तभी से गणेश जी एकदंत कहलाये जाते हैं ! इस कथा से हमें यह सन्देश मिलता है कि किसी भी परिस्तिथी में अपने माता पिता का सम्मान करना चाहिए ! उनसे अधिक पूजनीय किसी के लिए कोई भी नहीं है ! इस कथा से यह भी सन्देश मिलता है कि हमें अपने माता पिता की हर बात का मान रखना चाहिए!

इस प्रकार गणेश जी को एकदंत का नाम दिया गया !



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