कालरात्रि: मा दुर्गा का रौद्र स्वरूप

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मां दुर्गा के सारे स्वरूपो में से इस स्वरूप को रौद्र माना जाता है। मां कालरात्रि का पुजन नवरात्रि के सातवें दिन किया जाता है। यह स्वरूप ही ऐसा है की जिससे सामान्यत: देखनेवाला डर जाये। हालांकी माता का ये स्वरूप सिर्फ़ पापी और बुरी शक्तियों के लिये बुरा है जब की भक्तो के लिये तो माता शुभ फ़लदात्री ही है। माता के इस स्वरूप के कई अलग अलग नाम है जैसे की महाकाली, काली एवं भैरवी। माता कालरात्रि के अन्य नामो में धुमोरना और रौद्री भी शामिल है। माता का स्वरूप ही उन के इस नाम की पहचान है। माता कालरात्रि, दुर्गा के सारे स्वरूपो में से एक ही श्यामवर्ण है।

स्वरूप एवं उत्पत्ति:

माता के इस स्वरूप की उत्पत्ति के बारे में कुछ रोचक कथाएं उपलब्ध है। एक पौराणिक कथा के अनुसार माता कालरात्रि ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की शाक्तियों का समुचा स्वरूप है। माता कालरात्रि भगवान विष्णु की निद्रा भी मानी जाती है और ऐसा कहा जाता है की जब असुर मधु और कैटभ का आतंक चारो और फ़ैल गया तब भगवान विष्णु को निद्रा से जगाने हेतु भगवान ब्रह्मा ने माता कालरात्रि को पुजा था जिस के बाद भगवान के जागृत होने पर इन असुरो का नाश संभव हुआ।

माता का वर्ण अमावस से भी ज्यादा काला है। उन की आंखे बडी और चमकदार है और पुरा शरीर काला होने पर भी चमकीला है। उन के तीन नेत्र है जिस से वो भय, भुत और पिशाचो को दुर भगाती है पर भक्तो को आशिर्वाद देती है। माता भक्तो का सदैव शुभ ही करती है और इसी लिये उन्हे शुभंकरी भी कहा जाता है। माता के श्वास से वायुमंडल प्रभावित होता है और नि:श्वास से अगन ज्वालाएं निकलती है। माता के केश खुले और बीखरे है और उस से वो और भयावह दीखती है। उन के एक हाथ में लोहे का कांटा और एक हाथ मे खड्ग है। उन का एक हाथ अभय मुद्रा में है और एक हाथ वरद मुद्रा में है।

भक्ति और पुजन:

जो भी भक्त मन से चंचल और भयग्रस्त हो उसे माता कालरात्रि का पुजन करना चाहीए जो की भयहारी मानी जाती है। माता के स्मरण मात्र से भय, भुत, पिशाच एवं अन्य आसुरी शक्तियां दुर भागती है। तंत्र ज्ञान में भी माता के इस स्वरूप के पुजन को बडा ही माना जाता है। जो तांत्रिक ने माता दुर्गा की छे दिन भक्ति और आराधना की हो उस के लिये ये रात्रि सफ़लता की रात्रि मानी जाती है। कई जगह पर तांत्रिक रात्रि को साधना करते है और कुछ जगह पर बलि एवं मदिरा का प्रदान भी किया जाता है।

जो भी भक्त माता के इस स्वरूप की पुजा करता है, माता उस पर प्रसन्न होकर उसे हर आधि और व्याधि से मुक्त करती है। माता की भक्ति भक्तगणो को हंमेशा आनंद और लाभदायी ही होती है। योग साधको के लिये ये रात बहुत ही अहम है क्युंकी इस रात्रि को मन भानुचक्र में स्थित होता है जो की योगीओ के लिये बहुत ही बडी सिध्धी मानी जाती है। एक मत के अनुसार इस रात्रि को मन सहस्त्रार चक्र में स्थित होता है जो की बडा ही अलग अनुभव होता है।

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