ब्रह्मचारिणी माता – तप और तेज की दात्री

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नवरात्रि का त्योहार सनातन धर्म का एक महत्वपुर्ण त्योहार है जब शक्ति की पुजा एवं आराधना की जाती है। यह नौ दिन भक्त गण माता दुर्गा के अलग अलग रुपो की पुजा कर के सुख की कामना करते है। इन नौ दिनो में दुसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पुजा की जाती है। माता दुर्गा के अलग अलग स्वरूपो में से ये रूप सौम्य माना जाता है। माता ब्रह्मचारिणी  तप और शक्ति सिध्धी की स्वामिनि है और इसीलिये जो भक्त सिध्धी हांसल करना चाहते हो वो इस दिन माता के इस स्वरूप की भाव से पुजा करते है।

इस स्वरूप में माता ने सफ़ेद वस्त्र धारण किये है और मुख पर तेज के साथ असीम शांति प्रतित होती है। माता ने अपने एक हाथ में कमंडल और एक हाथ में माला धारण की है।

उत्पति एवं कथा: सिद्धि प्राप्ति के लिए करें मां ब्रह्मचारिणी की कथा

माता ब्रह्मचारिणी की उत्पति की एक महत्वपुर्ण कथा पुराणो में अर्जित है। इस कथा के अनुसार माता पार्वति को शिवजी को अपने स्वामी के तौर पर पाना था पर देवाधिदेव तो अपने तप में लिन थे। इसलिये माता पार्वति ने भी उन्ही की भांति हिमालय में विचरण करना शुरु किया और उन्हीकी तरह तप भी किया। माता ने काफ़ी वर्षो तक ध्यान किया, तप किया और निर्जला और निराहार रहे जिस के चलते उन का शरीर भी क्षिण हो गया। माता के कुछ भी ना खाने से इस स्वरूप को अपर्णा भी कहा गया है। यह देखकर देवो नें भी उन्हें आशिर्वाद दीया और सहायता करने हेतु कामदेव को शिव पर बाण चलाने को कहा जिस से शिवजी के मन में देवी के प्रति भाव पेदा हो। शिवजी पर कामदेव ने बाण चलाया जिस से उनका तपोभंग होने से देवाधिदेव ने उसे अपना तिसरा नेत्र खोलकर भस्म कर दिया। बाद में देवो की गतिविधीयों से शिवजी को माता के तप के बारे में पता चला तो उन्हो ने रूप बदलकर माता की कसौटी की। उन्हे शिवजी के बारे में कइ नकारात्मक बाते और उन का चरीत्र बताया पर माता अपने निश्चय पर अटल रही। यह देखने के बाद शिवजी ने उनका स्वीकार किया और उनसे विवाह किया।

एक और कथा के अनुसार तारकासुर नाम का एक दैत्य था जिसे ये वरदान था की उसे केवल शिवजी का पुत्र ही मार पायेगा। शिवजी के विवाह न करने से देवो को इस दैत्य से मुक्ति नही मील रही थी और उसी के फ़ल स्वरूप देवो ने माता की सहायता की। शिवजी और पार्वति के विवाह उपरांत उन्हें कार्तिकेय पुत्र के रूप में प्राप्त हुए जिन्हों ने तारकासुर का वध किया।

आराधना:

माता के ब्रह्मचारिणी  स्वरूप को भजने की भक्तो और योगीजनो में बडी महीमा है। माता के इस स्वरूप को पुजने से कुंडलीनी जागृति के एक और कदम आगे बढा जा सकता है। यह स्वरूप मन को निर्भय, मक्कम और स्थिर बनाता है जो पुजक को आसान जिवन और अन्य कार्य जहां मन की स्थीरता जरुरी होती है वो करने में सहायक होता है। इस दिन साधना करने से मन स्वाधिष्ठान चक्र में स्थिर होता है जिस से कुंडलिनी जागृत करने मे बडी सहायता मिलती है।

ब्रह्मचारिणी माता का मंत्र

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ब्रह्मचारिणी माता का मंत्र – माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में द्वितीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

ब्रह्मचारिणी माता की आरती

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नवदुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति होती है. शास्‍त्रों में मां एक हर रूप की पूजा विधि और कथा का महत्‍व बताया गया है. मां ब्रह्मचारिणी की कथा जीवन के कठिन क्षणों में भक्‍तों को संबल देती है.

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