सिध्धिदात्री: मां का संपुर्ण आशिष स्वरूप

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मां सिध्धिदात्री माता दुर्गा का ही एक स्वरूप है जिसका पुजन नवरात्रि के आखरी (नौवे) दिन पर करने का विधान है। हिन्दुओ के इस पावन पर्व मे जो दुर्गा माता के नौ स्वरूप की पुजा होती है उस में से ये आखरी स्वरूप है। माता का ये स्वरूप न सिर्फ़ सौम्य है पर अतिशय मनभावक भी है जो भक्तो को माता की आराधना एवं सिध्धि प्राप्ति को प्रेरीत करता है। माता के इस स्वरूप की पुजा और योग साधना में बडी ही महत्ता है क्युं की माता का ये स्वरूप ही भक्तो को संपुर्ण सिध्धि प्रदान करता है।

स्वरूप और सिध्धि:

माता इस स्वरूप में बहुत ही मनोहर और तेजस्वी दीखती है। उन के सर पर मुकुट शोभायमान है जब की मुखमंडल अतिशय कांतिवान है। माता के इस स्वरूप में चार भुजाएं है। उन्होने एक हाथ में गदा, एक हाथ में चक्र और एक हाथ में कमल पुष्प धारण किये है। माता के एक हाथ में शंख भी है। गले में फ़ुलो की माला के साथ माता कमल पुष्प पर विराजित अति क्रांतिवान दीखती है। माता के इस स्वरूप में भी उन का वाहन सिंह है। वो समस्त सिध्धियो की स्वामिनी कही जाती है और इसीलिये जो भी भक्त सिध्धि हांसल करना चाहता हो उसे माता की इस दिन पुजा अवश्य करनी चाहिये। पुराणो के अनुसार कुल मिलाकर अठारा सिध्धियां होती है जो की भक्त माता के इस स्वरूप के आशिर्वाद से ही प्राप्त कर सकता है।

शिवजी को जब इन सिध्धियों की जरुरत पडी थी तब उन्होनें भी माता के इस स्वरूप का आवाहन कर के ही उन्हें प्राप्त किया था। इन सिध्धियो को दो जुथ में विभाजीत किया गया है।

इन सिध्धियों में अणिमा, लधिमा, गरिमा, महीमा, प्राकाम्य, इशित्व, वशित्व और प्राप्ति ये आठ सिध्धि का वर्णन पुराणो में भी है। इन के उपरांत अन्य सिध्धियों में कल्पवृक्षत्व, दुरश्रवण, सर्वकामावसियता, वाकसिध्धि, सर्वज्ञत्व, परकायप्रवेशन, सर्वन्यायकत्व, सृष्टि, अमरत्व, एवं संहारकरणसामर्थ्य जैसी दस और सिध्धियां है जो की माता सिध्धिदात्री के आशिर्वाद से भक्तो को प्राप्त हो सकती है।

पुजन:

माता के इस स्वरूप का पुजन भी सरल है, जिसमें अन्य देवी देवताओ, कुल देवता, ग्राम्य देवता, दश दिक्पाल एवं मुल स्वरूपो के पुजन के बाद माता के इस स्वरूप का पुजन किया जाता है। जो साधक योग साधना में लीन हो उस के लिये इस दिन को माता के इस स्वरूप के पुजन का बडा महत्व है। इस दिन साधक को निर्वाण चक्र का भेदन करना होता है इस लिये इस पुजन से वो निर्वाण चक्र में मन को आसानी से प्रविष्ट करवा सकता है। माता की अनुकंपा से यह कठीन साधना भी सरल हो जाती है और साधक को मन चाही सिध्धि प्राप्य हो जाती है।

एक सामान्य भक्त की मनोस्थिति भी माता समजती है और उसे मनोवांछीत कामना एवं कार्य पुर्ति का आशिष देती है। माता के इस स्वरूप के पुजन से मन के सारे भय और सांसारीक समस्याओ से मुक्ति सहज हो जाती है। जो भी परिवार माता के इस रूप का पुजन करता है उसका घर धन धान्य से भरपुर रहता है और किसी भी बात की कमी नही रहती।

मां सिध्धिदात्री का पूजा मंत्र

Maa Siddhidatri Mantra

सिद्धगन्‍धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि,
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।

माता का बीज मंत्र-

ऊॅं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नमः ।।

मां सिध्धिदात्री की आराधना में दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोकों का उच्चारण किया जा सकता है।

मां सिद्धिदात्री की आरती

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