Story of holy river Ganga (गंगा पौराणिक कहानी)

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गंगा और भगीरथ कहलाने वाली गंगा नदी भारत की सबसे महतत्वपूर्ण व पवित्र नदी है | ये करोड़ो भारतीयों का आस्था का प्रतीक है| पौराणिक कहानियो के अनुसार गंगा पृथ्वी से पहले स्वर्गलोक में प्रवाहित होती थी |

गंगा पृथ्वी पर क्यों आई| इसे कोन लेकर आया और गंगा को पृथ्वी पर लाने का क्या कारण था| गंगा को पृथ्वी पर लाने के पीछे काफी पोराणिक मान्यताए एव कहानिया प्रचलित है|

एक बार और्व ऋषि अयोध्या घूमते हुए राजा सगर के घर पहुंचे | राजा सगर की दोनो रानियों ( केशिनी व महती ) ने बहुत मान-सम्मान किया | ऋषि ने प्रसन्तापूर्वक दोनों रानियों को पुत्र प्राप्ति का वरदान दे दिया| परन्तु ऋषि ने कहा की आपका एक पुत्र ही वंश वृद्धि कर सकेगा|

कुछ समय बाद उचित समय पर रानी केशिनी ने असमंजस को जन्म दिया और महती ने साठ हज़ार पुत्रों को जन्म दिया|

अपने पुत्रो के बड़े होने पर तथा अपने प्रभाव को दिखाने के लिए राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ शुरू करवाया | सगर के बढ़ते प्रभाव से इंद्रदेव चिन्तित हो गये | इंद्र ने यज्ञ में विघ्न डालने के लिये यज्ञ के घोड़े को चुरा कर कपिल ऋषि के आश्रम में छिपा दिया | इधर राजा सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रो को अश्व खोज में लगा दिया| सब जगह तलाश पूर्ण होने पर सगर के पुत्र कपिल ऋषि के आश्रम पहुंचे एव अश्व को वहा बंधा हुआ पाया |

ऋषि तपस्या में लीन थे | उन्होंने सोचा ऋषि ने जानबुजकर घोड़े को चुराया है और ऋषि को अपशब्द बोल दिये | ऋषि ने गुस्से में आकर सगर के साठ हज़ार पुत्रो को भस्म कर दिया |

सगर अपने पुत्रो के बारे में सुनकर शोकाकुल हो गया | उसने अपने पोत्र अंशुमान को ऋषि के पास क्षमा प्रार्थना के लिए भेजा | उसकी बातो से ऋषि प्रसन हुए | ऋषि ने यज्ञ का घोड़ा लोटा दिया साथ ही सगर पुत्रो के उद्धार का रास्ता बताते हुए बोले “अकारण मृत्यु को प्राप्त हुए सागर पुत्रो का उद्वार  केवल पवित्र गंगा ही कर सकती है”| इसलिए गंगा को पृथवी पे लाने का प्रयास करो|

यज्ञ समाप्त होने पर सागर ने गंगा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करने लगे| उसकी मृत्यु के बाद पौत्रा अंशुमान ने भी तपस्या जारी राखी| परिणामस्वरुप दिलीप के पुत्र भागीरथ की आस्था और कठोर तपस्या से भगवान् विष्णु प्रसन्न  हुऐ एव गंगा को धरती पर ले जाने की परमिशन देदी|

जब गंगा पृथवी की और प्रवाहित हुई तो उसका वेग बहुत तेज था| ऐसी स्थिति में भगवान् शिव ने गंगा को अपनी जटाओ में स्थान देकर गति शांत की| भागीरथ का अनुसरण करते हुए गंगा सागर पुत्रो की भस्म तक पहुंची| गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से सागर पुत्रो का उद्वार हो गया|

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